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काँगड़ा किला | जिला काँगड़ा

काँगड़ा किला | जिला काँगड़ा, हिमाचल प्रदेश | कांगड़ा किले का इतिहास

इतिहासकारों के अनुसार कांगड़ा किले का शिलान्यास कांगड़ा राज्य के राजपूत परिवार का महत्वपूर्ण एवं गौरवशाली इतिहास है ।यह किला कितना प्राचीन है इसकी पुष्टि आप इस तथ्य से कर सकते कि हमारे महाकाव्य महाभारत एवं पुराण में भी इनके शासन एवं वंशजों का जिक्र किया गया है। यदि हम हिमाचल की बात करें तो यहां के निर्मित किलो में सबसे विशालकाय एवं भारत के अन्य प्राचीन किलों में यह सबसे प्राचीनतम किला माना जाता है। इतिहास के पन्नों में किले के विषय में बहुत ही रोचक जानकारी मिली है। जैसे कि सन् 1615 में एक मुगल सम्राट जो कि अकबर के नाम से जाना जाता था ।उसने कांगड़ा किला को चारों तरफ से घेर लिया परंतु उसे इसमें असफलता मिली। जिसके उपरांत सन् 1620 में अकबर का पुत्र जहांगीर ने चंबा के राजा को विवश करके किले को अपने अधीनस्थ कर लिया ।इतिहास के पन्ने को उलटने पर यह भी पता चलता है, कि मुगल सम्राट जहांगीर ने सूरजमल को एक मोहरे के रूप में इस्तेमाल करके अपने सैनिकों के माध्यम से किले में प्रवेश प्राप्त किया।

कचोट वंश के राजाओं ने मुगल शासक पर संपूर्ण नियंत्रण कर लिया मुगलो की सेना एवं हथियारों में पहले की अपेक्षा कमी आ गई थी ।जिससे परिणाम स्वरूप कचोट वंश के राजाओं को सर्वाधिक लाभ प्राप्त हुआ ऐसा माना जाता है, कि सन् 1789 में राजा संसार चंद II ने अपने पूर्वजों के द्वारा सुरक्षित किले को मुगलो के हाथ में जाने से बचा लिया, इसके लिए महाराजा संसार चंद ने अपने प्रतिद्वंदी यानी गोरखाओं के साथ कई लंबे युद्ध किए जिसमें एक तरफ गोरखा और वही दूसरी तरफ सिख राजा महाराजा रणजीत सिंह के नेतृत्व में युद्ध हुआ था ।संसार चंद्र किले को उपयोग  अपने पड़ोसी शासक राजा को बंदी बनाकर इसी में कैद करके रखने के लिए करता था । फलस्वरूप वहां पर कैद राजाओ ने एकजुट होकर अपना एक गुट तैयार कर लिया और इनको हराने के लिए नई नई योजनाएं बनाने लगे । सिखों एवं कटोच के मध्य एक युद्ध हुआ । जिससे यह विदित कि  मुख्य पट सेना की  आपूर्ति उद्देश्य के लिए खोल दिया जिसका परिणाम यह  हुआ, कि सन् 1806 मैं गोरखा सेना इस खुले द्वार के माध्यम से किले में प्रवेश प्राप्त किया है ,यही सेना आगे चलकर महाराजा संसार चंद एवं महाराजा रंजीत सिंह के मध्य एक गठबंधन होने का परिणाम भी रहा ।कालांतर में 1809 में गोरखा सेना को घुटने टेकना पड़ा ।अपनी रक्षा के उद्देश्य वह युद्ध करने से पीछे हट गई एवं सतलुज नदी को पार करके हाथ खड़े कर दिए। इसके अतिरिक्त सन 1828 में यह किला कटोचो ने अपने अधीन कर लिया इसके पीछे कारण यह था कि संसार चंद की मृत्यु हो चुकी थी उसके उपरांत रंजीत सिंह के हाथ यह किले का हस्तांतरण हो चुका था। इतिहास में दर्ज  जानकारी के अनुसार 1846 में सिखों के साथ युद्ध में हुए युद्ध में ब्रिटिश के आने से तदुपरांत इन्होंने इस किले पर संपूर्ण रुप से कब्जा कर लिया था परंतु दुर्भाग्यवश 4 अप्रैल 1905 में आए एक भयंकर भूकंप के परिणाम स्वरूप उस क्षेत्र को तत्काल रुप से छोड़ना पड़ा जिससे कि किला किसी के अधीनस्थ नहीं रहा।

कांगड़ा किले के बारे में विशिष्ट जानकारी

  • इस किले की विशेषता है, यह समुद्र तट पर 350 फुट की ऊंचाई पर बनाया गया है ,और यहां औसतन 4 किलोमीटर की दूरी में में फैला हुआ है।
  • कांगड़ा से धर्मशाला शहर की दूरी की बात करें तो वह मात्र 20 किलोमीटर है।
  • जैसा कि इतिहास में वर्णित है , कि प्राचीन काल में कांगड़ा किला धन-संपत्ति एवं समृद्धि शाली की श्रेणी में आता था। जिसके परिणाम स्वरूप मोहम्मद गजनी ने अपनी चौथे अभियान के तहत पंजाब पर विजय हासिल करने के उपरांत वाह 1009 ईसवी में कांगड़ा पर प्रस्थान किया।
  • इस किले में प्रवेश लेने के लिए एक छोटा सा बरामदा है। जिसमें दो द्वार के बीचो -बीच स्थित है किले में पहुंचते ही शिलालेख में दो प्रवेश द्वारों को सिख के शासन के समय इसका निर्माण कराया गया।
  • किले की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए 4 अति प्राचीन दीवारें जो लगभग 4 किलोमीटर की लंबी है मेहराबदार जो मुख्य द्वार पर प्रवेश के लिए महाराजा रणजीत सिंह के राज्य काल में इसका का निर्माण किया गया था, परंतु कालांतर में जहांगीर ने इस प्रवेश द्वार को तोड़कर उसके स्थान पर नवनिर्मित प्रवेश द्वार बनवाया जिसे जहांगीरी दरवाजा भी कहा जाता है।
  • इसके अतिरिक्त इसके ऊपर दर्शनी दरवाजा है । जिसकी विशेषता है, कि दोनों और इसके दोनों ओर यमुना एवं गंगा की प्रतिमाएं देखने को मिलती है। ऐसा माना जाता है, कि किले के  आंतरिक भाग का प्रवेश द्वार है। इस किले के माध्यम से धौलाधार की सुंदर पहाड़ियों का मनोहारी दृश्य देखा जा सकता है ।यह किले की सुंदरता और बढ़ा देती है।
  • मुख्य मंदिर के अतिरिक्त किले का सुरक्षा द्वार है ।जिसे अंधेरी दरवाजा के नाम से भी जाना जाता है।
  • प्राचीन कांगड़ा के निकट पहाड़ी के उच्च शिखर पर जयंती मां एक मंदिर स्थित है । इतिहासकारों के अनुसार इस मंदिर का निर्माण गोरखा सेना के सेनापति द्वारा निर्मित कराया गया था।
  • किले के पिछले भाग में बारूद खाना ,मस्जिद ,सूखा तालाब, फांसीघर ,बारादरी, कपूर तलाब, शिव मंदिर इसके अतिरिक्त कई प्राचीन कुएं आज भी प्रमाण स्वरूप स्थित है।
  • देश विदेश से भ्रमण करने वाले सैलानी किले के अंदर वॉच टावर, ब्रजेश्वरी मंदिर, लक्ष्मी नारायण मंदिर एवं आदिनाथ मंदिर के दर्शन करने की अभिलाषा को पूर्ण करने के लिए आते थे।
  • इस किले की प्राचीनता की पुष्टि इस बात से हो जाती है। इसके प्राचीनतम अवशेष जो प्राप्त हुए हैं ।वह 9वी और 10बी सदी में स्थापित हिंदू एवं जैन मंदिरों में काफी समानता देखी गई है।
  • वैसे तो कांगड़ा किले पर विभिन्न तरह के शासकों ने कब्जा कर लिया एक शासक दूसरे को आधीन करके किले पर अधिकार स्थापित कर लेता था, परंतु अंग्रेजों के शासन के समय 4 अप्रैल 1905 को एक तूफान के चलते यह किला को काफी क्षति पहुंची और अंत में यहां कटोच वंश को हस्तांतरित कर दिया गया।
  • पर्यटन की दृष्टि से भी इसके लिए को बहुत महत्वपूर्ण माना जाता है। किले की देखरेख के लिए रॉयल फैमिली ऑफ कांगड़ा ,आर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया एवं हिमाचल सरकार समस्त गतिविधियों में नियंत्रण लगाने का कार्य करती है।
  • सबसे अधिक समय तक यह किला महाराजा संसार चंद के अधीन था। जिसके चलते  रॉयल फैमिली ऑफ कांगड़ा के माध्यम से वर्ष 2002 में किले में ही एक संग्रहालय की स्थापना हुई । जिसमें कटोच वंश के शासकों एवं उनके मध्य हुए युद्ध के दौरान उपयोग में लाई गई सामग्री, बर्तन, सिक्के ,पेंटिंग्स ,अभिलेख एवं हथियारों को रखा गया है।

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